असफल वो भी अपने घर की चौखट पर
माने तो उनके अपने ही नहीं
फिर कुसूर क्यों दे जवानी को सब
जब ख्वाब दोनों के पूरे ही नहीं
जले दीपक निगाहों से हुई दीवालीयां कितनी
मगर फिजाओं में कहीं रौशनी ही नहीं
प्रणय की वेदना में जब बहे कुछ नीर आंखो से
नदी की शांत धारा में कहीं चहल ही नहीं...
---श्रीवास्तव_गौरव


