कोई यह नहीं सोचता कि मनुष्य जीवन में प्रेम करता क्यों है अगर निस्वार्थ प्रेम की भावना में अलगाव की संभावना है तो प्रेम का जीवन में महत्व क्या है..

मनुष्य इतना विवेकशील नहीं है जो प्रकृति के क्रियाकलापों को बेहतर तरीके से समझ सकें..

हम खुद को इतना महान समझने लगते है और सोचते है जो भी मेरे द्वारा हुआ उसमें कर्ता मैं ही हूं जबकि कर्ता यह प्रकृति है जो मेरे द्वारा किसी कार्य को संपन्न करवाती है..... और प्रेम का जीवन में उतना ही महत्व है जितना किसी मछली के लिए पानी का होना.... प्रेम के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है.. प्रेम कैसे व्यक्ति या वस्तु से है और कैसा प्रेम है, यह बात व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करती है...!!


आजकल अकेला हूँ, फिर भी जब एकदम तन्हा होता हूं.. कमरे के सन्नाटे के अलावा और कोई आवाज सुनाई नहीं देती है... जब बैठे होने पर सोने का मन करता है और लेटने के बाद भी जब घंटों तक नींद नहीं आती... पुरानी यादों का जमघट सा लगा रहता है.. उसी में कभी मुस्कुराना और कभी उदास हो जाना लगा रहता है.. तो सोचता हूं.. क्या मैं ही गलत था या हालात गलत थे..

फिर याद आता है.. मैं और तुम का हम होना.. कितना अच्छा था..क्या हालात थे वो कितना सुकून था उस दरमियां जब हम होने के सपने सच हुए थे...

किसी ने सच कहा है कि

वक्त रहता नहीं ठहर कर, आदत इसकी भी आदमी सी है

ऐसा नहीं है कि मैं और तुम बदल गये हैं बस अब पुराने हालात नहीं है क्योंकि तुम तो किसी का साथ पाकर फिर से हम में बदल गये मगर हमारे वाले हम का मैं जो मैं हूं आज अकेला और तन्हा हूं ...

बातचीत न करना अलग बात है लेकिन समझ नहीं आता कि बातें करें भी तो क्या बातें करें


अब इंतजार बस उसी का है जो इस तन्हाई को दूर कर दे और ऐसा नहीं है कि इतने बड़े संसार में कोई और मिलेगा नहीं...

क्योंकि जिन रिश्तों की नींव सिर्फ सच्चाई, भरोसे और प्यार के एहसास से बनाई जाती है उसकी मीनार को हिला कर जमींदोज करने की ताकत तूफ़ान में भी नहीं होती...


विवाह की अग्नि इस बात की परिचायक है कि रिश्ता तप कर मजबूत होगा..


तुम अपने हम को अग्नि में तपा कर मजबूत करने की कोशिश करते रहो, मैं अपने हम का समय आने पर उस अग्नि में तपने से पहले ही अपनी सच्चाई और भरोसे से अपने हम के रिश्ते को इतना मज़बूत कर लूंगा जिससे भविष्य के तूफ़ानों की तीव्र गति वाली हवायें भी मीनार से बातें करते हुए बगल से निकल जायेंगी...