यदि कोई कर्ण अधर्म के पक्ष में रहते हुए भी किसी द्रौपदी के चीरहरण पर राजसभा में खड़े होकर यह बोलने का साहस रखता हो कि महाराज धृतराष्ट्र आपकी सभा में अन्याय हो रहा है, और इस अन्याय के लिए इतिहास कभी आपको क्षमा नहीं करेगा.. ।।

तो ऐसे योद्धाओं का सम्मान होना चाहिए...!!

कर्ण जैसा महान योद्धा होना बड़ा मुश्किल है..

सूर्य के पुत्र थे, अर्जुन से ज्यादा योग्य और ज्येष्ठ भी थे, महर्षि परशुराम के शिष्य थे, दानवीर थे...

कर्ण को अंग देश का राज्य तो मिला लेकिन उस मार्ग तक पहुंचने में बाधाएं कम नहीं थी..

गुरु द्रोणाचार्य ने आसान शब्दों में कह दिया कि वह सिर्फ राजपुत्रों को शिक्षा देते है, पांचाल नरेश की सभा में कहा गहा कि इस स्वयंवर का लक्ष्य भेदन किसी सूतपुत्र के लिए नहीं है, हस्तिनापुर के रंगभूमि में कहा गया कि यहां पर शक्ति प्रदर्शन सिर्फ राजपुत्रों का होगा... इन सब बातों में कहीं न कहीं कर्ण ने अपमानित होने का अहसास किया होगा..!!

अपमान एक विष के समान है जो मृत्यु तो नहीं देता परन्तु जीवन में विष घोल देता है और अपमानित व्यक्ति सदा प्रतिकार की आशा से जीता है..!!

प्रतिशोध की अग्नि को शांत करना जल के लिए भी असंभव है....

कर्ण की मृत्यु यह संकेत देती है कि जीवन में श्राप का भी अपना महत्व होता है क्योंकि एक श्राप में वह शक्ति है जो सहस्र अच्छे कर्मों द्वारा अर्जित पुण्य को समाप्त करने की क्षमता रखती है..

इसिलिये जीवन में अच्छे कर्म करना चाहिए पर इस बात से हमेशा सचेत रहना चाहिए कि भूलवश किसी का श्राप ना मिले....


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- - - - - - - - - - - - - - - - - श्रीवास्तव गौरव