तुम चुनाव में सामने आते हो

गरीब के घर जाकर खाते हो

ये जनता तुम्हें जिताती है, 

तुम ख्वाब नये दिखलाते हो.... 


कोरे कागज सी ये जनता 

तुम नये कलम की स्याही हो 

जनता बिलख बिलख कर रोये 

जैसे काली बदली छायी हो


ये सरकार तुम्हारी है 

तुम ही इसके राजा हो

पांच साल में नहीं दीखते 

देते केवल झासा हो 


एक मदत ना कर पाओ 

सो जाओ चद्दर तान के 

दूध दही और घी मलाई 

खाओ सब कुछ छान के


जनता के हो सेवक तुम

इसका तुमको भान नहीं 

वोट दिया जो आशा से 

उसका भी सम्मान नहीं 


तुम जो इतना इठलाते हो 

सबको रौब दिखाते हो 

टैक्स के पैसा पर ही तुम

इतनी सुविधा पाते हो 


चप्पल टूटी पहन के तुम 

वोट मांगने आते हो 

जीत गये जो गलती से

शूट बूट सिलवाते हो


पांच साल से मंत्री तुम

अरबों रूपया डकार गये 

ऐसी गणित लगाये तुम 

न्यूटन भी बाजी हार गये 


चोर उचक्के साथी तुम्हरे 

खाते थाली बाट के 

हास्पिटल के चक्कर काटे 

जनता मरती खाट पे 


केन्द्र में बैठे दादा तुम 

अपने बच्चों का भी ख्याल करो 

मंत्री बनकर जितना लूटे 

उस पर एक सवाल करो 


आक्सीजन की कमी से जनता 

मरी कोरोना काल में 

दादा-पोते के चक्कर में 

जनता हुई हलाल रे 


हमनें तुमको वोट दिया है 

देते टैक्स का पैसा है

पोस्टरों पे मुफ़्त लिखाकर

गले काटने जैसा है 


तुम बग्घी में अकड़ के बैठे

जनता घोड़े जैसी है 

जिस दिन चक्का टूटेगा 

होनी ऐसी तैसी है 


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 श्रीवास्तव गौरव