वक्ष पर धर शीश अपना मन रूमानी हो गया

होठ के स्पर्श से स्वर्णिम कहानी हो गया 

रात की वह चादंनी मुझसे लिपटकर सो गयी 

दर्द की तन्हाईयां जाने कहां पर खो गयी 

कुछ देर के इस प्रीत में संसार सारा दिखता 

प्रेम करने का तरीका उनसे मैं हूं सिखता 

भोर की वह सिसकियाँ मध्धम सी होती जा रही 

और बारिश की ये बूँदें पाप धोती जा रही

और फिर सहसा किसी ने जोर से कुछ कह दिया 

स्वप्न टूटन का वह दर्द हमने भी उठ कर सह लिया

 


_ _ _ श्रीवास्तव गौरव