सुनो नंद सखी!

तुम नंद का किरदार कुछ इस तरह निभाना

कि तुम्हारी भाभी के समक्ष नंद शब्द आने से उनकी रूह में कंपन न हो!

बल्कि यह शब्द सुनकर उनके मन में तुम्हारे प्रति तड़प होनी चाहिए!

सखी तुम मित्रता निभाने के पश्चात नन्द के जटिल रिश्ते को निभाना।

जब रिश्ता तुम मित्र बनकर सरलता से निभाने में सक्षम हो सकती हो तो तुम्हें कठोर नंद का किरदार क्यों निभाना!

अर्थात सखी तुम सामाजिक रिश्ते को नहीं,
खुले दिल से रिश्ता निभाना।