ये कैसी शर्त है, इंसा बाहर है वैसा ही भीतर मिले
दुआ बस इतनी कर , बद-तर से ज़रा बेहतर मिले
मेहबूब है आज, कल मुखालीफ़ हो , मुमकिन है
मुमकिन है पाक दिल के हाथ में कल खंजर मिले
लफ़्ज़-ए-मुहब्बत सर-ब-सर मेरे बे-आवाज़ ही रहे
जब भी मिले वो, महव-ए-तसव्वुर में अक्सर मिले
पेश-ए-नज़र कर दिया था दिल मैनें हम-नफ़स को
उसे मिले भी तो फ़कत दिल में दफ़न पत्थर मिले


