सर्दियों की मीठी धूप में,
निकली हवा बौरायी-सी;
कहीं पर्वतों से भीड़-सी गयी,
कहीं जुल्फें लहरायी भी।
कभी लताओं को झुमाया,
कभी बेलों से लिपट-सी गयी;
किसी सागर से बह चली थी,
किसी आँचल में सिमट-सी गयी।
कहीं गुलों से सुगंध चुराया,
घर-आँगन को महका दिया ;
कभी जलते दिये को दिया बुझा,