वो जब साड़ी का पल्लू सँवारती है,
मेरी निगाहें जाने क्यों ठहर जाती हैं,
वो जब अपने बालों को कानों के पीछे करती है,
मेरी धड़कनें कुछ और बढ़ जाती हैं।
उसके चेहरे पर जब हल्की-सी मुस्कान आती है,
तो जैसे कोई सुबह मेरी आँखों में उतर आती है।
वो आईने में खुद को देखती है,
और मैं उसे देखकर खुद को भूल जाता हूँ।
उसकी हर अदा मुझे थोड़ा और अपना बना लेती है,
उसकी एक झलक ही दिल को जाने क्या-क्या कह देती है।
मैं सम्भल कर रहता हूँ,
जब वो बिंदी लगाती है।।
-सुरेन्द्र 'वीर' पंचारिया

