निजी रिक्शा का चालक है तो क्या हुआ, पांच साल की बच्ची का पिता तो है , सामने रिक्शे के हैंडल के साथ , हुक से लटका रखी है, नन्ही पैरो की चाँदी की पायलियाँ, रिक्शा के गति के साथ साथ, अपनी मौजूदगी को चम् चम् के साथ, दर्ज करती है ये नन्ही पायलियाँ, तनिक संकोच करते हुए पूंछ ही लिया, रिक्शा चालक मानो कहा गया झटका, अधेड़ उम्र का मुच्छड़,मजदूरी वाला चेहरा, धीमे से बोला -हां बाबु साहेब, हज़ार बार कहत है,नाही मानत है चुनिया, लटका रखा है कई दिना से, अपनी अमानत, यहाँ हमरी नज़रो के सामने,हम भी सोचत है, काह बिगाड़त है,इही नन्हे पेरो की पायलियाँ, कौन्ह्न जूरम पे हटाई दे एका इहा से ? और रिक्शा चालक ने एक नजर मुझे देखा और मैंने उसे, उमड़ रहा था दूधिया वात्सल्य छोटी छोटी आँखों से, विरलता भरी थी सीधे-सादे प्रश्न पर, और वे नजरे फिर से हो गई सड़क की ओर, और मैंने तनिक झुक कर कहा, हाँ भाई मै भी एक पिता हूँ| बस यू ही पूंछ लिया आपसे, अन्यथा ये किसको नही भाएगी नन्ही पैरो की छोटी सी पायलियाँ | नागार्जुन के कविता *गुलाबी चूड़ियॉं* से प्रेरित कविता |