मेरी स्याही लड़ती है इंकलाब की जंग


राष्ट्र के कुशासन को करके रहेगें भंग 


बहुत सह लिया हमने झूठे वादों नारों को


अब न सहेगें इक पल भी दुष्टों का आतंक