कुछ लोग जो अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों, अपने अंदर चल रहे विचारों को दूसरों से साझा नहीं कर पाते और किसी ऐसी वस्तु को माध्यम बना लेते हैं जिससे वे अपनी सारी बातें कह जाते हैं।
ऐसी ही यह कविता है एक लड़की की जो अपने जस्बात सिर्फ चाँद को सुनाती है लेकिन चाँद की बेरुखी से निराश होकर तनाव से घिर जाती है। तनाव को अपने आप पर कभी हावी ना होने दें और हमेशा उससे निकलने का प्रयास करते रहें।
हर रात कुछ अधूरी बातें इन्तज़ार करती है,
सिर्फ तेरे ही आगे वो इज़हार करती है,
मसरूफियत से अपनी परेशान है वो,
ज़िन्दगी जीने से हर पल इंकार करती है।
इस कदर टूट चुका है सब्र उसका,
हर कदम पर अपने सवाल करती है,
खौफ ऐसा है अन्धेरों का उसे,
आँखें बंद करने पर भी मलाल करती है।
एक तू ही तो साथी है उसका हर रात का,
तेरी ही सलामती की दुआ करती है,
हाँ वो घबरा गयी है देख हर तरफ चेहरे हैवानों के,
खुद को तुझसा मिटाने की चाह करती है।
तू बे-खबर हो गया है उसकी वीरानी से,
मशगुल है तू अपने ही इश्क़-ए-फ़ानी में,
भूल मत तुझे भी खत्म होना ही है एक दिन,
बड़ा इतरा रहा है तू अपनी जवानी में।
दर्द उसके जो सिर्फ तुझसे बयाँ होते हैं,
अपने भी यहाँ अपने कहाँ होते हैं,
होते अगर तो ना होता ये अंधेरा जीवन में,
चाँद के भी अपने सितारे कहाँ होते हैं।
तो ऐ चाँद! गुरूर ना कर तू अपने हुस्न पे,
जो कभी एक-सा रहता नहीं है,
मिट जाता है तू भी इस रात के कालेपन में,
कोई तारा भी तेरे पास टिककर रहता नहीं है।
चले जाया कर उसकी बातों को पूरा करने,
नीन्द भी उसको अब गवारा नहीं है,
जज़्बे को उसके थोड़ा मज़बूत बना देना,
तेरे सिवा उसको कोई और प्यारा भी नहीं है।
- सौरभ जी.


