तुम इतना जो लड़ते हो, जो इतने तंज कसते हो,

सच बताओ नयी-नयी ये क्या साज़िशें रचते हो।


क्यों पास तुम इतने आते हो, बातें इतनी बनाते हो,

क्या छुपा है मन में अपने क्यों ना तुम बताते हो।


क्या होता जो कह देता मैं अपने मन की बात,

रुठ ना जाती तुम मुझसे, रक्खो दिल पर हाथ।


ना कहती तुम मुझसे, ना लेती और सफाई,

बात ये ऐसी कैसे मेरे मन में आयी।


मैं जो तुमसे कर देता थोड़ा भी इज़हार,

कर बैठती तुम भी मुझ पर अपने शब्दों से वार।


मैंने सोचा कहीं टूट ना जाए दोस्ती की ये डोर,

तुम ही बताओ प्रिये मैं अब करता भी क्या और।


नहीं होता बिल्कुल भी ऐसा, ना होती कोई लड़ाई,

मैं भी तुमसे कह देती जो बात मैंने है छुपायी।


तुम जो मुझसे कह देते कि प्यार तुम्हें है मुझसे,

तो मैं भी शायद कह देती है प्यार मुझे भी तुमसे।


देरी इतनी कर दी तुमने कहने में छोटी-सी बात,

अब तो हाथ से निकल गयी है इतनी सुन्दर रात।


- सौरभ जी.