ये माना कि तेरे शहर में रिवाज़ कुछ अलग है,

मेरा भी यक़ीं करना, मेरे अन्दाज़ कुछ अलग है।


बिना देखे तेरी आमद का पता चल जाता है मुझे,

तेरी पाज़ेब की झंकार में आवाज़ कुछ अलग है।


तेरे नशेमन का आस्माँ भी ज़्यादा नीला है वहाँ,

तेरी गलियों में तो मौसम के मिजाज़ कुछ अलग हैं।


तेरी उँगलियों पर सजे पत्थरों के क्या कहने,

तेरी सोहबत में नीलम-पुखराज कुछ अलग है।


हर रात तुझे सजदा कर सोता होगा वो चाँद भी,

सुबह-सुबह आफताब का आगाज़ कुछ अलग है।


तेरे इशारों के तरीक़ों का तो क़ायल है "सौरभ",

तेरी नज़रों से होना नज़र-अंदाज़ कुछ अलग है।


- सौरभ जी.