एक चिड़िया जिसके चारों ओर गिद्ध खड़े हैं घेरे,

बात ये जो आज़ादी की पचती नहीं है मेरे।


बात तो ये वो हो गयी,

तू लड़की काहे को हो गयी,

पिछ्ले जनम के फूटे भाग हैं ये तेरे,

बात ये आज़ादी की कैसी, पचती नहीं है मेरे।


गिद्ध नहीं ये दानव हैं,

खूँखार आदिमानव हैं,

सपनों और अरमानों को नोच लेंगे तेरे,

बात ये आज़ादी की कैसी, पचती नहीं है मेरे।


सरकार बोले आगे बढ़, घर-बार डाले बेड़ियाँ,

बेटे को तो माफी है, फटकार झेले बेटियाँ,

भगवान भी अंधा है अब, उसको घाव दिखते नहीं है तेरे,

बात ये आज़ादी की कैसी, पचती नहीं है मेरे।


बदलाव हमको लाना होगा,

सर लज्जा से झुकवाना होगा,

हर वर्ग के वो लोग जिनकी सोच के है ना सिरे,

ये बात कि आज़ाद है हम, अब तक पची नहीं है मेरे।


- सौरभ जी.