कब तलक़ ये मन की कहानी चलेगी,
और कितने दिन ये जवानी चलेगी,
थक कर कहीं चूर हो ना जाए,
हमेशा ना एक-सी रवानी चलेगी।
सफ़र तो अभी थोड़ा लम्बा है घर का,
धीरे-धीरे ही तब तक ये गाड़ी चलेगी,
अगर तू हो ना-खुश सफ़र ज़िन्दगी से,
साँसों की जगह बंद आहें चलेगी।
बैर तो कई ले लिये तूने सब से,
क्या अब भी तेरी तल्ख ज़बानी चलेगी,
है तकरार तेरी हर शय से "सौरभ",
ऐसे तो ना ज़िन्दगानी चलेगी।
कब तलक़ ये मन की कहानी चलेगी,
और कितने दिन ये जवानी चलेगी।
- सौरभ जी.


