बेनाम सा एक शक्स कहीं खो गया है,
थक कर तलाश में किसी की, वो सो गया है,
चंद बूँदें विचारों की कहीं दूर छोड़ आया है,
बेबाक, बेपरवाह नदियों सा खुद को समेट लाया है,
इसी विश्वास में कि,
कहीं तो किनारा उसे भी नसीब होगा,
जहाँ किसी का होना ना होना, कहाँ ज़रूरी होगा,
खुद में ही वो बस मचलता रहेगा,
अपनी ही गहराइयों में ऊछलता रहेगा,
कभी दिखाई देगा, कभी अदृश्य होगा,
कभी शांत होगा, कभी ताण्डव रचेगा,
कभी विष भी होगा, कभी अमृत बहेगा,
कभी झरना बन खाई में जा गिरेगा,
कभी विकराल रूप धर, लहर बन उठेगा,
बनेगा जब सागर, मद चूर-चूर होगा,
सभी बैचैन नदियों को खुद में समा लेगा,
अपने आगोश से सूर्य को जन्म देगा,
अंतत: होगा वो खामोश, नींद से जाग उठेगा।
-सौरभ जी.


