सोचते थे कि वक़्त पर आवाज़ उठाएंगे,

वो वक़्त भी ना जाने अब क्यों नहीं आता।


रवैया ये मतलबी दुनिया का,

अब हमसे देखा नहीं जाता,

हर कोई लगता है क़ातिल यहाँ,

चेहरे से किसी को परखा नहीं जाता।


ज़ुल्म करते-करते भी थकता नहीं इंसान,

उसको अब ख़ुदा का खयाल क्यों नहीं आता।


ये मंज़र इन्तज़ार का,

हमसे तो सहा नहीं जाता,

खामोश तो रह लें,

पर ज़बाँ से खामोश रहा नहीं जाता।


अब क़लम का ही तुझको आसरा प्यारा है "सौरभ",

किसी के खिलाफ़ बोलो तो उनसे सुना नहीं जाता।


- सौरभ जी.