जिस तरफ भी मैं चलूँ उसकी नज़र है,
हर क़दम पे मेरे अनदेखा शहर है।

रात से होकर सुब्ह की ओर देखो,
ये तेरा तेरी तरफ़ जाता सफ़र है।

देख चुप-चुप सा रहा है आज तक वो,
छेड़ ना इसको ये तो ठहरा क़हर है।

आता है आकर चला जाता है बार-बार,
टिम-टिमाते तारे जैसा ये क़मर* है।

रोज़ देखो तो नया सा लगता है ये,
ये वही सूखा हुआ उजड़ा शजर* है।

कहने को तो बात कह देता वो 'सौरभ',
उसके हाथों में ज़ुबाँ जैसा हुनर है।

- सौरभ जी. 'विहारी'

*क़मर = चाँद
*शजर = पेड़