दस्तक ये अचानक किसकी आन पड़ी है,

इस अंधेरे कमरे में तो मेरी जान पड़ी है।


हर इंसान वाक़िफ़ है मेरे हाल से यहाँ,

इस दफा आहट क़दमों की अन्जान पड़ी है।


देखो इन बेचारे फूल-पेड़ों की रंगत,

अबके बहारें भी यहाँ सूनसान पड़ी है


रहा करते थे यहाँ कुछ लोग किसी ज़माने में,

तुम्हारे जाने के बाद ये हवेली वीरान पड़ी है।


कभी इस शहर का हर रास्ता तेरा पता जानता था,

अब तेरे नशेमन की सड़क ही गुमनाम पड़ी है।


रोज़ निकल जाता है ये किसकी खोज में 'सौरभ',

ठहर कभी इधर तो, उधर ज़िन्दगी तमाम पड़ी है।


-सौरभ जी.