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बस नाम का खुदा है...

मेरा सब्र अब टूट रहा है,

साथ खुद से छूट रहा है,

होकर आग मेरा दु:ख अब,

ज्वाला बनकर फूट रहा है।


हल्की आँच पर सुलग रहा है,

ये तन जैसे झुलस रहा है,

उबार रूह में उठ रहा हैं,

चीर के छाती पूछ रहा है,

कितना और संघर्ष बचा है,

जीवनभर का विष लिखा है,

क्यों इतना बे-दर्द खुदा है,

या मेरे कर्मों की सजा है,

भुगत लिया इतना तो मैंने,

अब भी क्या और बचा है।

Tag: poetry और2 अन्य
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