मेरा सब्र अब टूट रहा है,

साथ खुद से छूट रहा है,

होकर आग मेरा दु:ख अब,

ज्वाला बनकर फूट रहा है।


हल्की आँच पर सुलग रहा है,

ये तन जैसे झुलस रहा है,

उबार रूह में उठ रहा हैं,

चीर के छाती पूछ रहा है,

कितना और संघर्ष बचा है,

जीवनभर का विष लिखा है,

क्यों इतना बे-दर्द खुदा है,

या मेरे कर्मों की सजा है,

भुगत लिया इतना तो मैंने,

अब भी क्या और बचा है।


दर्द दे तो हिम्मत भी दे,

मेरे श्रम की कीमत भी दे,

सक्षम पर ही मेहरबान है तू,

ज़रुरतमंदों का हैवान है तू,

मनुष्य नहीं हो कर भी,

उससे ज्यादा बेईमान है तू।


बोल तेरी रज़ा क्या है,

मुझसे ही इतना खफ़ा क्या है,

मुझे मेरी गलती का हिसाब दे,

या फिर तू इन्साफ दे,

अब तक किया है विश्वास तुझ पर,

या अपने होने को झूठा करार दे।


- सौरभ जी.