अब तो अगन भड़के श्याम,

तोरे दरस मन तरसे श्याम,

सावन भी मोहे रास ना आवे,

रिमझिम-रिमझिम बरसे श्याम।


आस नयनों को तेरी श्याम,

प्यास झरनों को तेरी श्याम,

सन्गीत भी अब ना सुहावे,

सरगम, सरगम में उलझे श्याम।


बरस बीते पलकें झपकाए,

फिर भी ना एक पल बीते श्याम,

तेरी लगन में थम जाए साँसें,

मन आगे-पीछे तड़पे श्याम।


कोयल का भी राग अलग है,

मेरा अनुराग तू ही श्याम,

भर लूँ अपनी साँसों में तुझको,

फिर दे दूँ उनको भी विराम।


एक-आत्म का बोध करा दे,

नाम तेरे तन कर दूँ श्याम,

मुझको अपना मोह करा दे,

मन भी कर दूँ अर्पण श्याम।


देह, देह का भेद करे है,

मैं देह तेरे रंग, रंग दूँ श्याम,

रूह, रूह का मेल भी देखे,

ये रूह तेरे संग कर दूँ श्याम।


तेरी भोली मुस्कान पे मैं तो,

सुख भी सारे कर दूँ वार,

"सौरभ" कहे पतवार पकड़ अब,

"माधव!" भवसागर से कर दो पार।


- सौरभ जी.