ज़िम्मेदारियों की बात ना करोसाहब,हर सुबहकाँधो पे ख़्वाबों के बोझ लियेज़िन्दगी के पत्थरों से भरी गलियों से,ठोकरें खा के गुज़रता हूँ मैं।
ज़िम्मेदारियों की बात ना करोसाहब,
हर सुबहकाँधो पे ख़्वाबों के बोझ लिये
ज़िन्दगी के पत्थरों से भरी गलियों से,ठोकरें खा के गुज़रता हूँ मैं।