सिलसिला रंगो का
मै गोरी तू काला,कब तक चलेगा ये सिलसिला,
क्यू ये रंग करवाता है, रिश्तों के बीच फासला।
ना जाने कितने दिल टूटने,की वजह है ये रंग,
बड़ी बेदर्द है ये, किया है कितनो की खुशियों को भंग।
करते है गोरे रंग को ही, क्यू पसंद सब,
कैसे समझाऊं तुम्हे ,दुख देना बंद करो अब।
परवाह नहीं अब ज़माने कि,मुझमें बहुत है खूबियां,
गोरे काले का भेद कर,तुम लाख निकालो मुझमें कमियां।
उड़ूँग आसमानों में,उस गगन को भी छूउगी,
नहीं काट सकते तुम मेरे पर,अब दर्द का घूट नहीं पीउगी।
रगों में बहते खून, क्या करते है भेदभाव,
फिर तुम क्यू खींच रहे हो,मेरे बढ़ते हुए पाव।
क्यू गोरे को आगे,और काले को रखते हो पीछे,
बंद करो अब उसे दिखाना ,कदम कदम पर नीचे।
कतई नहीं तोड़ सकते,तुम मेरा हौसला,
मै गोरी तू काला,अब बंद करो ये सिलसिला
अब बंद करो ये सिलसिला |


