हों रहीं धूसर दृष्टि
पाताल के भाँति व्यतीत होने लगीं सृष्टी
ज्वलंत अग्नि सी वृष्टी
सबकी कामनाओं ने जला दी धरती
न कभी जीव अथवा निर्जीव की सुद्ध ली
बस विवशता का अकारण देकर
शीतल आकाश में ताप्ती वायु भर दी
इस विनाश को रोके तो कैसे रोके हम ?

अब बस! बहुत हुआ! ऐसा कहकर,
अपने अंतर्मन में अब झाँक कर देखें हम l

भीतर एक प्रचंड अंधकार हैं ,
ऊंचे दर्शन की प्रतीक्षा में बैठा ,
रिक्त शून्य सा
सत्य से भरने को आतुर!

तो क्यों न अब ज्योति जलाये हम
आत्म दीपो भव को साकार करें l

प्रज्वलित करें भीतर के प्रेम, निष्ठा और धैर्य को.!

मनुष्य ऊंचा उठें ऊंची चेतना में
सृष्टी तब सम्भल जाएगी अपनेआप

एक सीध में ले आए वक्र हो चुकी हमारी सूझ बूझ को
तब सृष्टि नदी के भाँति बहने लगेगी
साफ़ पानी सी दिखने लगेगी
न कोई प्यासा होगा न भूखा

बंजर मृत्यु से फिर जीवन उठे साँस लेता

तब एक नयी भोर होगी
शुद्ध चेतना की
जब मनुष्य को होगी
प्रचिती अपने जीवन यात्रा की....l

-कवि ज्योत देव (दिव्येश).

#globalwarming
#pollution

Cover photo by John Lautermilch.