अब हो ऊंची चेतना का जागर
हम क्यों पीछे रहें स्वयं को उठाने में
अब हम शिक्षित हो स्वयं को जानने में l

सैंकड़ों प्रश्न उठे है
त्रिकाल चल रहें विचारों से विचलित होती भावनाओं में
अब समय न रहा उनमे उलझने में

अब हम उठे और प्रयास करें उन्हें सुलझाने में
सशक्त करें हम अपने आत्मज्ञान की ज्योत को
न जाने हम कबसे लिप्त रहें
व्यर्थ के अंधकार में

झूठी आशाओं का दामन छोड़
अब चल पड़े हम सत्य के मार्ग में
होगा संघर्ष थोड़ा सा किंतु विश्वास है हमे अपने समर्पण के भाव में l

अगुवाई करें हम एक नए समाज की रचना में
ढेर करदे असत्य की भित्तियों को
तब अंकुरित होंगे लाखों बीज
जो दमित बैठे है सत्य की एक बूंद की प्रतीक्षा में l

अब विलंब न हो मनुष्य की जागृती में
प्रकाशमय हो उठे सत्य
अब असत्य से भरें इस अंधकार में
हम स्त्रोत बने सही समझ के
स्थिरता और ठहराव से भरें सूझबूझ में l


अब स्वयं को पहचान ले कि
हम मात्र भौतिक शरीर नहीं
मनुष्य का जीवन सार हैं-
स्वयं को इश्वर के निकट ले जाने में
क्योंकि सारा प्रेम और आनंद भरा है
श्री तत्व के मुक्त निर्वाण में......l


-कवि ज्योत देव (दिव्येश)।