गुजारिश ए जमाने रंगे बू से तू नहा मुझको,
कभी तो उफ कहूँ कुछ इस तरह से तू सता मुझको,
तेरे दामन के सारे फूलों की दे कर मुझे खुशबू,
इन्हें चुभने लगे जो काँटे थे वो भी दिखा मुझको,
के कैसे तू घरौंदों में मिटा आता है नन्हीं भूख,
हुनर चुगने का दाने दाने वाला तू सिखा मुझको,
जो आ के तेरे आंचल में सुबह और शाम करता है,
पता उस जादुगर अश्फाक का अब तो बता मुझको,
क्यूँ तू ने अपने चेहरे के ही जैसा मुझको कर डाला
हुस्न वाले सिखा दी तू ने है अब तो दगा मुझको,
तू अपनी आशिकी से मुझको भी बर्बाद कर दे
अब ना जाने क्यूँ सही लगने लगी तेरी रजा मुझको,
बडी गमगीन दुनिया है गुजारिश आदमी की
अब खुदा से छेड कर जुमला कोई अब तो हँसा
मुझको गुजारिश ए जमाने रंगे बू से तू नहा मुझको......
कभी तो उफ कहूँ कुछ इस तरह से तू सता मुझको...