जो कभी मुफ़्त की दिखती थी, आज वो भी बिकती हैं। जब थी पेड़ लगाने की बारी, तब ख़ूब चली थी आरी। अब क्यों तू रोता है, क्यों चैन से न सोता है। अब क्या कमी तुझे लगती है, तेरी लकड़ी तो लाखों में बिकती हैं....!