नई ज़िंदगी का रास्ता


वो चीखती सी खामोशी, 

और गुमसुम सा शोर, 

कुछ इस तरह दफन होते हैं दोनों मेरे अंदर, 

कि मर कर भी नहीं मरते,

रोज कोई नया बहाना,

और फिर दहकते हैं जले हुए अंगारे,

कुछ ऐसे जैसे कि मशालें जल जाये, 

और दिखाने लगें एक नया रास्ता,

पर वो नहीं जो बाहर ले जाता है,

वो जो मिलाता है एक नई गहराई से,

जहाँ पड़े हैं अनगिनत बीज,

नई चोटें नये दर्द बनने को तैयार, 

अपेक्षाओं के ये बीज तुम ही तो लेके आये थे, 

फिर इन्हें उम्मीद की खाद भी नहीं मिली, 

और न ही मीठी बोली के झरने का पानी,

आज भी लड़ रहे हैं ये उपेक्षा की गर्मी से,

यकीन मानो ये उगेंगे, 

ओर बढ़ेंगे बिना किसी सहारे, 

चुभेंगे फिर मुझे ही,

क्यों कि पनप तो वहीं रहे हैं।

शायद इनका दर्द काट सके,

मेरी खामोशी की चीख को,

चुप कर सके मेरे गुमसुम से शोर को, 

फिर पनप सकूँ मैं भी,

देख सकूँ नये खिलते कोंपलों को, 

और बढ़ सकूँ आगे एक नयी ज़िंदगी की ओर...