कल
कल पलट कर देखूँ तो ,
कुछ उलझनें सुलझी नजर आती हैं,
फिर कल पलट कर देखूँ तो,
जिन्दगी एक बार उलझी नजर आती है,
ये बीता हुआ कल और आने वाला कल ,
कितने अलग हैं,
जो बीत गया वो भाने लगता है,
जो बीतने वाला है वो तरसाने लगता है,
जो बीत रहा है उसमें जी नहीं पाते हम,
फिक्र आने वाले कल की,
जिक्र बीते हुए कल का,
दोनों के बीच में आज तो कहीं खो ही जाता है,
कितना उत्साह उस शिखर की चोटी तक पहुँचने का,
वहाँ पर पहुंच कर बढ़ जाती है घाटी की सुंदरता,
गुजरते हुए जिसे हमने नज़रें घुमाकर भी नहीं देखा,
वही सुंदरता हमें लुभा रही है,
व्याकुल बनाने की हद तक भा रही है,
सही ही तो है हम बीते हुए को रोते हैं,
इन दोनों कल में आज को खोते हैं,
काश हमारे अंदर का ये मंथन,
हमारे आज को अमृत प्याला बनाये,
और हम जान सके कि कितना अनमोल हो सकता है,
हमारा आज में जीना,
भूल पायें बीते हुए कल को और आने वाले कल को,
आज पकड़ो मेरा हाथ और बैठो उस घाटी में,
आज ही देखो उसकी सुंदरता को,
आज में महसूस करो मेरे हृदय के स्पंदन को,
चलो नये आयाम दो इस जीवन को,
सीखो इसे जीने के नए तरीके,
और बिता लो इन पलों को,
जो आज में ही खूबसूरत हैं,
बिल्कुल हमारे और तुम्हारे इस पवित्र प्रेम की तरह,
जिसमें कल का कोई बल नहीं,
आज में ही जियेंगे हम,
एक दूसरे के कंधे पर सर रखकर,
एक दूसरे में खोये हुए,
बस यूँ ही आज में बीतेगा हमारा जीवन...


