ये मार्केटिंग का ही कमाल है,
कि थूहर की घर - घर धमाल है।
देखो गुलाब नर्सरी में पड़े हुए हैं।,
दौर नहीं रहा ? यही सवाल है।
क्योँ, कैसे, कब, कौन पूछे ? सब मौन हैं!
कोशिश भी करे, किसकी मजाल है?
मोहब्बत के खून से रंगे हैं उसके हाथ,
अब भी उन्हें मुगालता है कि गुलाल है।
अपने वादे से साफ मुकरता जाता है बार-बार
आदमी होशियार है बहुत और बेमिसाल है।
जैसे को तैसा की आदत अब भी नहीं गई,
सोमेश अब भी नहीं सुधरे, अजब जंजाल है।
