सावन की घटा सुन री ऐ सावन की ठण्डी हवा पागल सी उड़ती ओ काली घटा सूरज को छिपाके तू आँचल में क्या चाहती है मन ही मन में बरसा के अपनी मोती सी बूँदें कर दूँगी जल थल, सूखी ये धरती भीगे पवन और भीगे ये अम्बर बन जाए ये जग जन्नत सा सुन्दर हर एक दिल की प्यास बुझ जाए तपते हुए मन शीतल हो जाएँ ख़ुशी से हैं झूमे शाखा लताएँ फूल बिखेरें अपनी अदाएँ लग जायें झूले उसके आंगनवा मौसम में ऐसे नाचेगा मनवा पड़ेंगी फुहारें जो रिमझिम रिमझिम अल्हड़ सी गोरी नाचेगी छमछम