क्या हो की कोई साथ भी रहे और बिछड़ जाए
ये वैसे है जैसे निकला हुआ आंसू आंखो में जाए
वो एक शख्स मेरा हम, मेरी दुनिया मेरा जहान था
वो जा चुका! तो अब जिसको भी जाना है वो जाए
वो परिंदे जो एक मंजिल का ख्वाब देखते थे कभी
क्यों ना अपने पंख नोचे जब रास्ते जुदा हो जाए
क्यों करता है ज़माने की फिक्र इतना उन्हे छोड़
तू इधर को आ मेरा साथ बैठ कुछ राब्ता हो जाए
इस उम्मीद में मेरे सजदे बढ़ जाते है अक्सर
जब वो कहे कुन और तू मेरा हो जाए
जौन से मुहब्बत की अलामत भी कमाल है
जब पढू मैं उसका चेहरा तो वो फारिहा हो जाए
