इतिहास भी यही बताता है, इंसा-इंसा को सताता है,

निर्बल जान के बिटिया तेरा ज़मीर भी मारा जाता है।


बेबस लाचार बेचारी बन अब भी क्यों सहती जाती हो?

लेकर खंजर तुम हाथों में, खुद को क्यों नहीं बचाती हो?


तुम लक्ष्मीबाई रानी हो, फूलन जैसी सरदार हो तुम।

तुम ऊशा जैसी उड़नपरी, शोभा जैसी एथेलेटिक तुम।


मैरी कॅाम सा दम तेरे मुक्के में, जो करदे सबकी साँसें गुम।

धूम मचा सकती हो तुम, फिर क्यों रहती हो तुम गुम सुम ?


बो क्या तुम्हें बचाएंगे जो खुद भेड़ियों से बिकते रहते हैं,

जो जाति धर्म और ऊँच नीच की राजनीतियाँ करते हैं।


क्यों नही जान पाती हो तुम इंसानों मे छिपे भेड़ियों को?अब घर में दुबकी नहीं हो, दुनिया की भीड़ से वाकिफ हो।


सब गर्व करेंगे तुम पर बहना, भीड़ से हरदम बचकर रहना,

रखना खुद को गर तारों में, तो सूरज की चमक से बचना।


सूरज का दम भी तेरे आगे एक दिन फीका पड़ जाएगा,फिर बादल क्या तुम्हें दबाएगा, खुद बूँदों में बह जायेगा,


खुद की रक्षा करना बहना जिस दिन तुमको आजाएगा,

फिर कोई माँ का लाल, बाल का वाँका न कर पाएगा।

✍️ जे के गौतम “ज़िद्दी जीतू”