‘मेरे पापा’

क़लम उठाने की जिसने,

हिम्मत दी इन हाथों को,


ज़िम्मेदारी का बोझ उठाने,

दी ताक़त इन कांधो को,


अहम भूमिका पिताश्री की,

उस दिन समझ में आती है,


जब बच्चों की ज़िम्मेदारी,

अपने सर पर आती है!


अब जीवन के कठिन फ़ैसले,

खुद हमको लेने होते,


अब दिखता है दिन भर में ही,

कपड़े कैसे मैले होते,


जब दो दो पाई जोड़ जोड़ के,

मुट्ठी भर भर देने होते,


अब समझा मैं पिता जी तुमने,

फटे वस्त्र क्यों पहने थे,


मैंने पत्नी को एक अंगूठी,

जब बनवाई गहने में,


अब याद  रही माँ ने क्यों,

गहने नक़ली पहने थे,


बिना पिता की याद गुजरता,

ऐसा दिन कोई शेष नहीं,


बच्चों को पिता से बढ़कर,

कोई पुरुष विशेष नहीं!


क्या लिक्खूँ कविता उसपे,

खुदजिसकी मैं रचना हूँ,


बिना आपके पिता श्री जी,

शृष्टि की ना संरचना हो!

✍️जे के गौतम ‘ज़िद्दी जीतू


मेरा साहसमेरी इज्जतमेरा सम्मान हैं पिता!

मेरी ताक़तमेरी पूँजीमेरी पहचान हैं पिता!!


ग़ुस्सा दिखता है पापा का,

प्यार नहीं दिखता,

सब मिल जातासिवाय पिता का,

लाड़ नहीं दिखता!

✍️ स्मृति राय ‘अनामिका