जंगल उजड़ रहे हैं,
पंछी बिछड़ रहे हैं,
आशियाना अपना बचाने,
आदिवासी ही लड़ रहे हैं!
आज इनके हितों की लड़ाई,
लड़ने वाला एजेंडा नहीं है,
हैं बहुत क्रांतिकारी यहाँ पर,
करामाती बिरसा मुंडा नहीं है!
महफूज हैं अपने अपने घरों में,
फ़िक्र तपती जमीं की नहीं है,
सजाते हैं गमलों में पौधे,
कटते वृक्षों से आशिक़ी नहीं है!
...
जल जंगल की रक्षा का,
खुद लेना होगा संज्ञान,
बिरसा मुंडा बनना होगा,
तब ही होगा ऊलगुलान !
✍️ जितेन्द्र गौतम


