मैं इन हवाओं में, इन फ़िज़ाओं में मैं इस वसीअ नीले आसमाँ में गहरे भूरे ज़मीं में मैं मैं नाज़ुक साफ-शफफ ओस की बूँदों में खुरदार सफ़ेद पहाड़ों में भी सुर्ख़ नर्म गुलाबों में मैं ख़ार-दार हरे काँटों में मैं मैं सख़्त सुरमई चट्टानों में रूई से हल्के समंदर के झागों में मैं ज़रीन दहकते सूरज में चाँदी से शीतल चाँद में मैं ख़ुद को इन सभी में पाती के ये मेरे ही जुज़्व-ए-दिल, जुज़्व-ए-तन इनमें ही तो समाई हूँ मैं मेरे टूटे टुकड़ों को समेट, जोड़ फिर मुकम्मल कर देते हैं ये मुझे।