ऊपर वाला भी क्या कमाल दिखाता है बिन माँगे मोती बरसाता है और इन मोतियों में ख़ुशबू भी तो है किसकी? अरे तब्दीली की भाई! जिसे ज़माना अपने जुनूँ से नयापन क़रार देता जा रहा है उस ऊपरवाले के हुक्म पे सर झुकाए अपने पसीने से ये चमकाता जा रहा है। कुछ लाल का सा रंग हो चला है अब इन मोतियों का जी हाँ! ख़ून बहेगा तभी तो इंक़लाब आएगा! बस अब इन लाल मोतियों को अपने आँगन में लगाना है आज नहीं तो कल नहीं तो कुछ अर्से बाद ही सही इनमें फूल तो खिलेंगे न किसी दिन? बस इनको अर्सा-ए-जिस्म तक सींचते रहिए रूह निकलते निकलते इनकी ताज़गी बरक़रार रखिए फ़िज़ूल की बेक़रारी नहीं, अपना सबब याद रखिए सबब-ए-दिल से करते रहिए सबब-ए-ज़िंदगी का क्या है? इन्हीं मोतियों को तो तराशते जाना है। आख़िर अपने मुहब्बत-पसंद ऊपरवाले के लिए ही तो ये लाल लहू बहाना है! अर्सा-ए-जिस्म ~ duration of body सबब-ए-दिल ~ reason of heart सबब-ए-ज़िंदगी ~ cause of life