देखो फिर पकड़ा ये झूठ तुम्हारा फिर इश्क़ की हुई रूस्वाई है इस झूठ सच के दायरे में तो रब्त-ए-जाँ की फिर हुई हार ही है पर जाने क्यों देख ये सूरत तुम्हारी हर झूठ लो फिर सच मान रही हूँ मैं तुम्हारी इन बाँहों के दायरा-ए-ख़ास में आ एक बार फिर तुमसे मग़्लूब हो गई हूँ मैं। रब्त-ए-जाँ ~ Bond, physical relation दायरा-ए-ख़ास ~ Special circle मग़्लूब ~ conquered