ये किस क़दर है घुटन गला जैसे कोई कसके दबोच रहा मेरी चाहतों को आग लगा रहा! और ये बेमानी बेहिसाब चाहतों से भी तो है घुटन क्यों न इन चाहतों को इक छोटी सी डिबिया में दफ़ना दूँ उस डिबिया को दूर समंदर में बहा दूँ? पर ये औरों की उम्मीदों की घुटन? अलग अलग रूप रंग अलग अलग रिश्तों में उम्मीदें एक ही सी के मैं बन जाऊँ उन्हीं के मन की कोई छवी। पर नहीं मैं वो तो नहीं उनकी उम्मीदें नहीं क्यों न कभी उन उम्मीदों की भी बेड़ियाँ तोड़ उड़ जाऊँ इस घुटन से निजात पाऊँ...?