कुदरत ने सारे हुनर देकर भेजा
ज़माने को फिर भी कमी चाहिये।
जो ग़मगीन होकर भी हंसते सदा
आँखों मे उनके नमीं चाहिये।
क़दर भी हुई इस कदर बेकदर
बता दें कि हमको हमीं चाहिये।
सारी खुशी हमने देखी थी जिसमें
जाने का सबको यकीं चाहिये।
रोते हुए आए दुनिया में हम थे
उन्हीं को हमारी ज़मीं चाहिये।
मुक़द्दर बुलंदी पर पहुँचा नहीँ
वो हैं कि उनको हमी चाहिये।
सियासत की लत भी गजब चीज़ है
यकीनन यकीं को यकीं चाहिये।
कितने भी कपड़े औ ज़ेवर पहन लें
अंदर हैं नंगे यकीं चाहिये।
हमने कलेजे के टुकड़ों में भर दी
फौलादी तेवर यकीं चाहिये।
किससे कहें ? कौन कितना सुनेगा?
कोई भी हो ठोकर हमीं चाहिये।