रिसते हुए घावों पे लगा मल्हम साकी
चलना है बहुत दूर मंजिल है अभी बाक़ी
अजब है रंग-ए-सियासत, अजब नुमाइंदगी
कमतर जम्हूरियत में रंग-ए-राजशाही बाक़ी
हुकूमत से उम्मीद न कर कर खुद पे भरोसा
है बाज़ुओं में जोर जब तक और है लहू बाकी
हर नासूर फुर्सत से पका करता है ठीक होने को,
अभी चीख़ने के ढंग देखो, है दर्दे इंतहा बाक़ी
उतरेगी जीत की ख़ुमारी कि जब हवा नहीं होगी
किसकी रही है देर तक आसमां में पतंग बाक़ी
ना सोचना कि हाले दिल बयाँ क्यों कर रहा हूँ मैं,
कहीं उम्मीद थम न जाए लिख रहा हूँ जंग बाक़ी.