शहर की चकाचौंध में
दुनिया की भीड़ में
यूं ही एक शाम गुजरा
नाली के ऊपर वाली थड़ी पर
बचपन की हँसी को दबते देखा ।
न जाने कौन सी मजबूरी रही होगी
खेल,खिलौनों, स्कूल, किताबों से न जाने क्यों बढ़ी यह दूरी होगी
नन्ही उंगलियां बचपन की मौज मस्ती ख्वाहिशों को धुंधला कर
बर्तन चमका रही थी ।
आंखों में दर्द लिए
होठों पर नन्ही सी मुस्कान लिए
बचपन मां की ममता से दूर हो रहा है।
वाह!क्या जमाना है
बचपन मजदूरी कर रहा है
और बिगुल बजा है की
" देश विकास कर रहा है "
नन्ही सी आंखों में हजारों सपने लिए
मैले कुचेले तन पर कपड़े डाले
कलम,स्लेट,खिलौनों की उम्र मे
कप,प्लेट,जूठे बर्तन मांज रहा है
वाह! क्या जमाना है
बचपन मजदूरी कर रहा है
और बिगुल बजा है की
" देश विकास कर रहा है "
दिन भर काम करता है
अपनी भूख की खातिर कितनी सब्र करता है
जग जीवन का पता नहीं
चार दीवारों में नन्हें पैर दौड़ाता
सब 'छोटू' कह कर पुकारते
मालिक की डांट खाता
चंद सिसकियां भरकर चुप रह जाता
रोता हंसता 'छोटू' सबका पेट भर रहा है
वाह!क्या जमाना है
बचपन मजदूरी कर रहा है और
बिगुल बजा है कि
"देश विकास कर रहा है।"
कलयुग के इस रामराज्य में
मजबुरी है या बेखबर है हम
शायद वह पुरखों की थाती को
आगे बढ़ा रहा है
वाह! क्या जमाना है
बचपन मजदूरी कर रहा है और
बिगुल बजा है कि
" देश विकास कर रहा है।"
सतीश कुमार मेघवँशी " निशा "


