अब थक-सा गया है तन मन मेरा

बैठ गया हूं मैं उदास होकर

बैठा सोच रहा हूं क्या से क्या हो गया हूँ

जिम्मेदारी का मंजर ढोकर

मंजर धोते-धोते बीत गए हैं वे दिन

अब तो मंडराती है शांत काली रातें

मुझ पर बनकर साया

रोने लगा है मन मेरा क्योंकि

आज मुझे मेरा बचपन याद आया।

याद है आज भी मुझे वो बचपन के उजियारे

बन भौंरा उड़ गए न जाने कहाँ वो दिन प्यारे प्यारे

सुकुमार शैशव बनकर मैं था जब खेला

सुख देकर मुझे माँ ने था दुःख झेला

इस घर तो कभी उस घर

घूम घूम कर सभी का प्यार पाया

रोने लगा है मन मेरा क्योंकि

आज मुझे मेरा बचपन याद आया।

खूब घूमा बापू के कन्धे चढ़कर

देखे हाॅट बाजार और मेला

पढ़ लिख कर मैंने जग को जाना

हर पल रहा संगी साथी के संग

कभी न खुद को अकेला पाया

रोने लगा है मन मेरा क्योंकि

आज मुझे मेरा बचपन याद आया

भरपूर जवानी पाकर

तन मन में लिए फिरता था एक खुमारी सी

हर कोई लगता अपना-सा

क्या वो दुनिया सच में इतनी प्यारी थी?

रंगीन सी थी वो दुनिया

मैंने भी इस रंगीन यादों में खुद को पाया है।

रोने लगा है मन मेरा क्योंकि

आज मुझे मेरा बचपन याद आया।

बसा कर घर गृहस्थि रिश्ते नातों को मैंने निभाया है।

फक्कड़ बनकर जिता रहा जिंदगी

धर्म संस्कार रीति रिवाजों को बखूबी निभाया है।

बच्चों संग खेला बच्चा बनकर

हर सुख-दुःख में मैंने प्रियतमा के अथाह प्रेम को पाया है।

रोने लगा है मन मेरा क्योंकि

आज मुझे मेरा बचपन याद आया।

स्वछन्द बनकर रहा जग में

नहीं की खुशामद कभी किसी की

निकल गया वो जवानी का दौर

बिखर गयी अब वो मेरी दुनिया

आज हो गया हूँ निर्बल

बन गयी है जिंदगी विरान मरुस्थल-सी

इस विरान मरुस्थल में आज मैंने खुद को

कंटीली झाड़ी-सा पाया है

रोने लगा है मन मेरा क्योंकि

आज मुझे मेरा बचपन याद आया है।



"निशा"