किसे बताती आंसू ये सुख जाने दे।
गंगा बहती रहेगी आंसू सूखे यहाँ।
नही नही और आशा नही हो बस।
उठा शस्त्र कृष्ण नही आएंगे यहां।
ध्रतराष्ट्र चप्पे चप्पे में बैठे हुए यहां।
किसको दिखते है तेरे आंसू यहां।
निर्भया के बाद निर्भयाएं कितनी।
उठा शस्त्र कृष्ण नही आएंगे यहां।
उतार फेंक चूड़ियां दे आना उन्हें।
जो मर चुके जमीर वे सेल्फी हुए।
न दरिंदे दोषी न सता दोषी यहां।
बस्ती में मानवता मर गयी जहां।
नही दरकार कोई मोमबती लगाए।
तुम उनकी चिताएं सजाओ यहां।
समाज नही बनते सत्ता रक्षकों से।
बने हुए संभ्रांत संबंधियों से यहां।
सभ्य समाज मे मरना है रोज रोज।
क्यों घुट घुटकर मरना पड़ेगा यहां।
दे आना चूड़ियां उनको है जरूरत।
उठा शस्त्र कृष्ण नही आएंगे यहां।
तूने पैदा किया जिन्हें वे तुझे तोड़ेंगे।
ये औकात उन्हें जलील होना होगा।
तोड़ दे समाज के बंधन हो आजाद।
मुर्दो की बस्ती में जीना सीख यहां।
जो सभ्य समाज मे वमन करते रहे।
जो पत्रकारिता का पतन करते गए।
पत्रकारिता के दमन पर खुश यहां।
महिलाएं नही नग्न वे ही होते गए।
हाथों में थमाई मशाले वे गए कहां।
रक्षक ही बस्तियां जलाते चले यहां।
पोंछ डाल आंसुओ को बहुत हुआ।
उठा शस्त्र कृष्ण नही आएंगे यहां।

