
इस तन के रथ में जीवात्मा रथी जान
तन मेरा रथ हुआ सारथी हुआ है मन
सृष्टि मायाजाल आत्मा परमात्मा एक
गम और वैभव भोगता जा रहा है मन
इंद्रियां रूपी घोड़े जुते है खींच रहे रथ
रथ चला रहा है सारथी हुआ यह मन
संयम चाबुक से जो नियंत्रित करे मन
आत्मा को गन्तव्य पहुंचा आता मन <
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