बचपन की दहलीज मैं लांघ आयी।
साजन इंतज़ार में हर घडी बिताई।

पाल रखे है मैंने बरसो से सपने तेरे।
अब तो आकर मिल ले साजन मेरे।

सावन आ तनबदन में आग लगाए।
सखियां ससुराल में कैसे बतियाए।

बसाई मैंने अंखियों में तस्वीर तेरी।
अब तो आकर मिल ले साजन मेरे।

बिजली की चमकार बादल गरजते।
रिमझिम वर्षा तनमन भीगो जाए।

साजन नजरो में बसाए सपने तेरे।
अब तो आकर मिल ले साजन मेरे।

#सुरेश_गुप्ता
स्वरचित