भरमाता कोई नही होता स्वर्णमृग प्रिये
देवी जिद छोड़ो ये कोई आसुरी माया है
सृष्टि के इतिहास में स्वर्णमृग नही हुआ
देवी पहचानो इसे यह जग की माया है

देवी जिद पर अड़ी मृग खूब ही प्यारा है 
देव आस पूरी करो मन इस पर आया है 
नारीहठ के आगे पुरुष झुक ही जाता है
ले धनुष बाण चले रघुराई कैसी माया है

मायापति राम आज माया में भरमाये है
भार्या की आरजू को पूरी करने आये है
माया ठगिनी है यह सदा जग जानिनी है
कौन जीत पाया है स्वामी हारने आये है 

कोई बिरला ही बच पाता है इस जग में 
भक्ति में रहता है कीर्ति में फंस जाता है
बुद्धि से भक्ति मिले सीता बुद्धि रूप है
कीर्ति है स्वर्णमृग जो बुद्धि हर जाता है

#सुरेश_गुप्ता
स्वरचित