अदम्य आकांक्षा का बिछा जाल।
शरीर पिंजर में बन्द तोते सा मन।
वक्त के आघात सहता जर्जर तन।
वक्त है किधर क्यो भटकता मन।

जन्म मृत्यु चक्र से छूटता जीवन।
न मरे आशा तृष्णा मरता है तन।
पूजा आराधना में लग जाता मन।
भज गोविंदं मूढ़मते भज गोविंदं।

आशा बलवती जीवन विगलित।
मृत्यु सन्ननिकट न बचाते शास्त्र।
जर्जर शरीर तो कौन पूछता अन्न।
कमाता धन खा रहे परिवार जन।

छूटे नही जन्म मरण का बंधन।
भगवद गीता का अध्ययन कर।
गोविंद मुरारी का अर्चन तू कर।
भज गोविंदं मूढ़मते भज गोविंदं।

बचपन में खेल यौवन में मनमेल।
बुढ़ापे में चिन्ता ब्रह्म में नही मन।
अंग गलित आशा गांठ छूटे नही।
नारी कामना से बंधा रहता मन।

रात दिन बीतते आशा मरती नहीं।
कौन है कहाँ से आया तज विचार।
सार ये अमूर्त विश्व का ध्यान कर।
भज गोविंदं मूढ़मते भज गोविंदं।

गीता का हजारों बार गान तू कर।
ईश्वर का अनंत रूप मन में धर।
सज्जन का संग सदा श्रेयस्कर।
दीनजनों का मन से पोषण कर।

शरीर में जीव तो पूछते सब जन।
प्राण निकल जाता शरीर से डर।
छूटता नही है पाप का आचरण।
जीवन की मृत्यु है अन्तिम शरण।

तन पर फटे चिथड़े मलिन वस्त्र।
पुण्य और पुण्य से रहित जीवन।
नही मैं नहीं तुम न रहता जगत।
फिर शोक करने का क्या अर्थ।

दान दे तीर्थ ध्यान और व्रत कर।
सत्य साक्षात्कार बिना नही ज्ञान।
सौ जन्मों में भी मुक्ति है किधर।
भज गोविंदं मूढ़मते भज गोविंदं।