राजा हिमाचल के घर खुशियां छाई।
मां पार्वती का वहां अवतरण हुआ।
जन्मपत्रिका नारद मुनि को दिखाई।
वह अपवित्र है अमंगल वेषधारी है।

तपस्या रत सदा संसार से विरक्त है।
वह योगी रूप है भोगों से सदा दूर है।
सुन हिमाचल दंपति विचलित हो उठे।
पार्वती का वही महादेव वरण करेंगे।

प्रसन्न हो पार्वती कठोर तप कर रही।
शीत ताप सहकर तपस्या करती रही।
सदाशिव के ध्यान में मन लगाने लगी। 
निराहार पर्ण खाकर अपर्णा कहलाई।

जब बालक चीखने की आवाज़ आई।
मगरमच्छ से छोड़ने की गुहार लगाई।
बरसों के तप का फल देके छुड़ा आई।
महादेवसा वर पाकर पार्वती धन्य हुई।